brahma -sutra -bhashya of shri ... brahma -sutra -bhashya of shri shankaracharya in hindi (chapter i

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  • BRAHMA-SUTRA-BHASHYA

    Of

    SHRI SHANKARACHARYA

    IN HINDI

    (CHAPTER I.1)

    Translated by

    Sudhanshu Shekhar

  • 2

    Table of Contents PREAMBLE ....................................................................................................................................................... 3

    DELIBERATION ON BRAHMAN ............................................................................................................................ 6

    ORIGIN ETC. OF THE UNIVERSE .......................................................................................................................... 9

    SCRIPTURE AS SOURCE OF KNOWLEDGE OF BRAHMAN ....................................................................................... 12

    UPASNISHADS REVEAL BRAHMAN .................................................................................................................... 13

    FIRST CAUSE WAS CONSCIOUS.......................................................................................................................... 24

    THE BLISSFULL ONE ........................................................................................................................................ 33

    THE BEING INSIDE .......................................................................................................................................... 42

    SPACE ........................................................................................................................................................... 45

    PRANA .......................................................................................................................................................... 48

    LIGHT ............................................................................................................................................................ 51

    PRATARDAN ................................................................................................................................................... 57

  • 3

    PREAMBLE ऄध्यास भाष्य

    तुम और मैं प्रत्ययगोचर ििषय और ििषयी का, जो ऄंधकार और प्रकाश के समान ििरुद्ध स्िभाि िाल ेहैं, तादात््य युक्त

    नहीं ह,ै ऐसा िसद्ध होन ेपर, ईनके धमों का भी तादात््य िनतरा ंनहीं बन सकता, यह िसद्ध ही ह ै।

    आसिलए मैं प्रत्ययगोचर, जो िचदात्मक ििषयी ह,ै ईसमे तुम प्रत्ययगोचर, जो ििषय ह,ै ईसका एिं ईसके धमो का

    ऄध्यास तथा आसके ििपरीत ििषय में ििषयी तथा ईसके धमों का ऄध्यास िमथ्या ह,ै ऐसा युक्त ह।ै

    तो भी धमम और धमी, जो कक ऄत्यंत िभन्न हैं, आनका परस्पर भेद न समझकर, ऄन्योन्य में ऄन्योन्य के स्िरूप और ऄन्योन्य

    के धमम का ऄध्यास करके, सत्य (ऄपररितमनशील) और ऄनृत (पररितमनशील) का िमथुनीकरण करके, मैं यह और मेरा यह,

    ऐसा िमथ्याज्ञानिनिमत्त यह नैसर्गगक लोकव्यिहार चलता ह।ै

    पूछत ेहैं कक यह ऄध्यास क्या ह ै? आसपर कहत ेहैं—स्मृितरूप पूिमदषृ्ट का दसूरे में जो ऄिभास ह,ै िही ऄध्यास ह ै।

    कुछ लोग एक में दसूरे के धमम के अरोप को ऄध्यास कहत ेहैं । कुछ लोग कहत ेहैं कक िजसमें िजसका ऄध्यास ह,ै ईनका भेद

    न समझन ेके कारण होन ेिाला भ्रम ऄध्यास ह ै। कुछ लोग िजसमें िजसका ऄध्यास ह ैईसमे ििरुद्ध धममिाल ेके भाि की

    कल्पना को ऄध्यास कहत ेहैं ।

    किर भी, सभी मतों में ‘ऄन्य में ऄन्य के धमम का ऄिभास’ आसका व्यिभचार नही ह ै।

    आसी प्रकार, लोकव्यिहार मे भी यही ऄनुभि ह ैकक शुिक्त ही रजत के समान ऄिभािसत होती ह ैतथा एक चंद्रमा ही दसूरे

    के साथ मालूम पड़ता ह ै।

    ऄििषय प्रत्यगात्मा में ििषय और ििषय के धमों का ऄध्यास कैस ेहो सकता ह ै? सब लोग पुरोिती ििषय मे ही ऄन्य

    ििषय का ऄध्यास करत ेहैं । क्या ऐसा कहत ेहो कक ‘तुम’ आस प्रत्यय के ऄयोग्य प्रत्यगात्मा ऄििषय ह ै?

    सुनो – यह प्रत्यगात्मा ऄििषय नही ह ैक्योंकक यह मैं प्रत्यय का ििषय होन ेके कारण तथा ऄपरोक्ष होन ेके कारण प्रिसद्ध

    ह ै।

    और ऐसा कोइ िनयम भी नही ह ैकक पुरोिती ििषय मे ही दसूरे ििषय का ऄध्यास हो सकता ह ै। ऄप्रत्यक्ष होन ेपर भी

    अकाश में बालक तलमिलनता का ऄध्यास करत ेही हैं ।

    आस प्रकार प्रत्यगात्मा में ऄनात्मा का ऄध्यास ऄििरुद्ध ह ै।

  • 4

    आस लक्षण िाल ेऄध्यास को ही पंिडत ऄििद्या मानत ेहैं, और िििेक करके िस्तुस्िरूप के िनधामरण को ििद्या कहत ेहैं ।

    ऐसा होन ेपर िजसमें िजसका ऄध्यास ह ैईसके गुण ऄथिा दोष के साथ ईसका ऄणु मात्र भी संबंध नही होता ह ै।

    अत्मा और ऄनात्मा के ऄििद्या नामक परस्पर ऄध्यास को िनिमत्त मानकर सब लौककक और िैकदक प्रमाण प्रमेय का

    व्यिहार प्रिृत्त हुअ ह ैऔर सब िििध िनषेध परक तथा मोक्ष परक शास्त्र प्रिृत्त हुए हैं। किर ऄििद्याित ्ििषय में प्रत्यक्ष

    और शास्त्र प्रमाण कैस?े आस पर कहत ेहैं – दहे और आंकद्रय में मैं और मेरा आस ऄिभमान रिहत पुरुष का प्रमातृत्ि ऄिसद्ध

    होन ेपर (प्रमाता के ऄिसद्ध होन ेके कारण) प्रमाण की प्रिृित्त भी ऄिसद्ध होती ह।ै िबना आंकद्रयों को ईपादान बनाए प्रत्यक्ष

    अकद व्यिहार संभि ही नहीं हैं। और िबना ऄिधष्ठान के आंकद्रयों का व्यिहार संभि नहीं ह।ै िजसमे अत्मभाि ऄध्यस्त नहीं

    ह,ै ईस दहे स ेकोइ व्यिहार नहीं हो सकता। ऄगर यह ऄध्यास न हो तो ऄसंग अत्मा प्रमाता नहीं हो सकता तथा िबना

    प्रमाता के प्रमाण की प्रिृित्त ही नहीं होती। आसिलए प्रत्यक्ष और शास्त्र अकद प्रमाण का अश्रय ऄििद्यािान ्पुरुष मे ही हैं।

    और पशु अकद के व्यिहार से िििेकी पुरुष के व्यिहार मे ििशेषता नहीं ह।ै जैस ेपशु अकद शब्द अकद का श्रिण अकद स े

    संबंध होन ेपर शब्

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